राष्ट्रीय
क्या नीट पेपर लीक जैसी राष्ट्रीय समस्या को मोदी सरकार ने बहुत हल्के में लिया?
इस्लाम हुसैन, नैनीताल। सरकार के मंत्री संतरी आज कह रहे हैं कि पेपर लीक महापाप है पेपर लीक करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाएगी लेकिन पेपर लीक के पिछले मामले में सरकार की घोर लापरवाही ने सरकार की घोर असंवेदनशीलता दिखा दी थी। पिछले करीब एक महीने से पेपर लीक मामले में काक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन और उससे पहले राहुल गांधी के छात्रों के बीच जाने के बाद सरकार और पुलिस प्रशासन के व्यवहार से बिगड़े देश की हुई मौजूदा हालात के लिए मोदी सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है। सरकार ने अपनी छवि भाग्यविधाता वाली बना रखी है जिसमें संवाद की कोई जगह नहीं रखी है। अगर सरकार की मंशा इस मामले को सुलझाने की होती तो वो राहुल गांधी के देशभर में चलाए जा रहे छात्रों की गूंज कार्यक्रम और फिर छात्रों के जंतर-मंतर के अनशन से कुछ सबक लेती। लेकिन अधिनायकवादी मनोवृत्ति ने देश की युवा शक्ति में गुस्सा भर दिया। कहने वाले तो बहुत कुछ कह रहे हैं। जंतर-मंतर कांड के बाद अब इस मामले में जो स्थिति है वो बताती है कि सरकार ने पेपर लीक मामले को बहुत ही सामान्य और हल्के ढंग से ही नहीं लिया बल्कि घोर लापरवाही भी की है। यह बात निकलकर सामने आई कि पिछले पेपर लीक पर सरकार अपराधियों के ख़िलाफ़ समुचित कार्रवाई नहीं कर सकी सरकार की घोर लापरवाही से मुख्य आरोपी को अदालत से जमानत तक मिल गई है। मोदी सरकार की एजेंसियां तय समय सीमा में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकीं जिससे उन्हें बाई डिफ़ाल्ट जमानत मिल गई। इस पूरे कांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की जांच और अभियोजन व्यवस्था इतनी बड़ी परीक्षा-प्रणाली की सुरक्षा करने में सक्षम है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य आरोपी माने जा रहे संजीव मुखिया के खिलाफ समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं की जा सकी, और इसी कानूनी चूक के कारण उसे जमानत मिल गई। यह केवल एक आरोपी के छूट जाने की कहानी नहीं है। यह उस पूरे तंत्र की कहानी है जो परीक्षा की निष्पक्षता, छात्रों के भरोसे और सरकारी जवाबदेही—तीनों की कसौटी पर कमजोर पड़ गया। जब देश की सबसे प्रतिस्पर्धी और संवेदनशील परीक्षा में साजिश के आरोप लगें, गिरफ्तारियां हों, जांच एजेंसियां सक्रिय हों, और फिर भी समय सीमा के भीतर अभियोजन अपना काम न कर पाए, तो इसे साधारण त्रुटि कहकर टाला नहीं जा सकता। इस चूक का सबसे बड़ा नुकसान अदालत की फाइलों में नहीं, बल्कि छात्रों के मन में हुआ है। लाखों अभ्यर्थियों ने जिस परीक्षा को मेहनत, अनुशासन और निष्पक्षता का मैदान माना था, वही अब संदेह, अविश्वास और अव्यवस्था का प्रतीक बन गई। ऐसी स्थिति में सरकार की “कार्रवाई जारी है” वाली भाषा तब तक प्रभावी नहीं मानी जा सकती, जब तक कार्रवाई समयबद्ध, ठोस और परिणामकारी न हो। सवाल यह भी है कि क्या इस तरह की संवेदनशील जांच में देरी को महज प्रशासनिक चूक मान लिया जाएगा, या फिर जिम्मेदारी तय की जाएगी। अगर गिरफ्तारी के बाद भी चार्जशीट समय पर दाखिल नहीं होती, तो यह केवल अभियोजन की कमजोरी नहीं, बल्कि शासन-प्रणाली की विफलता भी है। इस दौरान मीडिया में यह भी खबरें उड़ीं कि मुख्य आरोपी का सत्तारूढ़ दल के साथ सम्बन्ध है। इस सबने छात्रों के मन में यह शक पैदा हो गया कि सरकार ने जानबूझकर इस मामले में लापरवाही की है। यह अलग बात है कि इस बार की नीट परीक्षा में एयरफोर्स को लगाने और मोदीजी के एयरपोर्ट में घंटा रूकने को प्रचार भी खूब हुआ लेकिन इससे छात्रों मूल शंका खत्म नहीं हुई। नीट जैसे मामलों में सरकार से अपेक्षा केवल बयान नहीं, सख्त और समयबद्ध कार्रवाई थी, जो नहीं हुई हुई। छात्रों का संसद पर मार्च करना कोई बड़ा अपराध नहीं था इसको मैनेज किया जा सकता था मंत्रियों की टीम छात्रों के मार्च से पहले मिल सकती थी। फिर जिस तरह जंतर-मंतर में छात्रों के साथ ज़ालिमाना सुलूक हुआ बेटियों को बेइज्जत किया गया वो कलंक तो सरकार के चिपक ही गया है। इसके साथ ही मीडिया के जनविरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश हो गया। नैनीताल समाचार. से साभार





























