राष्ट्रीय
आज 14 अप्रैल को है अंबेडकर जयंती : यदि मुझे लगा कि संविधान का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो मैं इसे सबसे पहले जलाऊंगा : अम्बेडकर
सीएन, नैनीताल। आज देश बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की 136वीं जयंती मना रहा है। डॉ. भीमराव अंबेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता कहा जाता है। संविधान के प्रति उनकी निष्ठा उनके इस विचार से लगाया जा सकता है कि भारत में संविधान ही सर्वोच्च है। उन्होंने कहा था यदि मुझे लगा कि संविधान का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो मैं इसे सबसे पहले जलाऊंगा ।स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में मध्य प्रदेश के महू में एक दलित परिवार में हुआ था। उन्होंने पूरा जीवन दलितों, शोषितों और पिछड़ों को उनका अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया। उनकी समानता और अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। हमेशा मजदूर वर्ग व महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। दलितों के मसीहा अंबेडकर महान चिंतक, समाज सुधारक, न्यायविद व अर्थशास्त्री भी थे। देशभक्ति के बारे में उनके विचार केवल उपनिवेशवाद के उन्मूलन तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे हर व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता भी चाहते थे। उनके लिए समानता के बिना स्वतंत्रता, लोकतंत्र और स्वतंत्रता के बिना समानता निरंकुश तानाशाही की ओर ले जा सकती है।आज भारत रत्न डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती पर हमें उनके महान व प्रेरणादायक विचारों को जन जन तक पहुंचाना चाहिए। आइए जानते हैं उनके कुछ विचार- धर्म मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य धर्म के लिए। मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है। जीवन लम्बा होने के बजाय महान होना चाहिए।. मैं किसी समाज की प्रगति को उसकी महिलाओं की प्रगति से मापता हूं। यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मों के शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए। हिन्दू धर्म में विवेक, कारण और स्वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। इतिहास बताता है कि जहां नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच संघर्ष होता है, वहां जीत हमेशा अर्थशास्त्र की होती है। निहित स्वार्थों को तब तक स्वेच्छा से नहीं छोड़ा गया है, जब तक कि मजबूर करने के लिए पर्याप्त बल न लगाया गया हो। बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। वे इतिहास नहीं बना सकते जो इतिहास भूल जाते हैं।समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा। यदि मुझे लगा कि संविधान का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो मैं इसे सबसे पहले जलाऊंगा। जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी है। आज के परिपेक्ष्य में जब देश का विपक्ष सत्ता पक्ष पर लगातार संविधान की उपेक्षा व दुरपयोग का आरोप लगा रहा है तो बाबा साहब कि कही गई पंक्तियों के मायने भी मंथन करने को विवश कर देते है। यह देश के सम्मुख गंभीर यक्ष प्रश्न है।
आंबेडकर की जयंती की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति का संदेश राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर की जयंती की पूर्व संध्या पर देशवासियों को शुभकामनाएं दी हैं। राष्ट्रपति ने अपने संदेश में कहा है, “भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माता और महान समाज सुधारक, बाबासाहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की जयंती के अवसर पर, मैं उन्हें सादर नमन करती हूं। बाबासाहब आंबेडकर एक विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, प्रखर चिंतक, न्यायविद और समतामूलक सामाज व्यवस्था के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपना जीवन समाज के वंचित और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया और उनके हित में ऐतिहासिक योगदान दिया। उन्होंने न केवल असमानताओं को दूर करने का मार्ग दिखाया, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों को सुदृढ़ करने में भी अग्रणी भूमिका निभाई। डॉ. आंबेडकर ने महिलाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों को प्राथमिकता दी। उनका बहुआयामी योगदान आने वाली पीढ़ियों को देश की सेवा और विकास में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करता रहेगा। इस अवसर पर, आइए हम बाबासाहब आंबेडकर के आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करने और एक न्यायपूर्ण, समावेशी तथा प्रगतिशील भारत के निर्माण में अपना योगदान देने का संकल्प लें।










































