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उत्तराखण्ड

पुण्य तिथि पर विशेष : 16 साल की यादों में गिरीश तिवारी ‘गिर्दा., आज हिमाला तुमनकैं धत्यूछों, जागो जागो ओ मेरा लाल…

चन्द्रेक बिष्ट, नैनीताल। उत्तराखंड के जन आंदोलनों में अपनी कविताओं व जनगीतों से जान फूंक देने वाले जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा की आज 16 वीं पुण्यतिथि है। 22 अगस्त 2010 को नैनीताल के कैलाखान अपने आवास में उन्होंने अंतिम सांस ली। जन आंदोलन से अस्तित्व में आए उत्तराखंड के लिए कई लोगों ने अपनी शहादत दी। इन तमाम शख्सियतों के बीच पृथक राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को अपने जनगीतों और कविताओं से धार देते थे गिर्दा। गिर्दा ने अपने गीतों से उत्तराखंड के भविष्य को भी रेखांकित किया था। उन्होंने नीतिकारों को भी चेताया था कि तुम्हारी काहिलियों से उत्तराखंड में बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार इस कदर पनपेगा कि उत्तराखंड के लोग जार-जार रोयेंगे। बाहरी धन्नासेठों का राज्य के संसाधनों में कब्जा हो जायेगा। शायद 26 साल पूर्व से अपने गीतों से उत्तराखंड के भविष्य को देख रहे गिर्दा वास्तव में सच बोल गये। आज जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा की 16 वीं पुण्यतिथि है। भले ही आज गिर्दा हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जितनी राज्य आंदोलन व उससे पहले जन आंदोलनों के समय हुआ करती थी। चाहे वो नवगठित राज्य में प्राकृतिक संसाधनों की लूट, शराब नही रोजगार दो हो और चाहे बेलगाम होती नौकरशाही। राज्य के निर्माण आंदोलन में अपने गीतों से पहाड़ी जनमानस में उर्जा का संचार और अपनी बातों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने का जो हुनर गिर्दा में था, वो सबसे अलग था। उनकी ये रचना इस बात की तस्दीक करती है। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के हवालबाग ब्लाक में जन्मे जनकवि का जीवन संघर्षों में बीता। लखनऊ की सड़कों पर रिक्शा खींचने के बाद वह दिल्ली सहित कई शहरों में रोजीरोटी के लिए भटकते रहे। इसके बाद उन्हें नाट्यप्रभाग भारत सरकार में नौकरी मिल गई। सरकारी नौकरी में रहते हुए गिर्दा ने उत्तराखंड में पृथक राज्य के लिए चल रहे आंदोलन की ऐसी राह पकड़ी कि वो खुद उत्तराखंड आंदोलनों के पर्याय बन गए, उन्होंने जनगीतों से लोगों को अपने हक-हकूकों के लिए ना सिर्फ लड़ने की प्रेरणा दी. बल्कि, परिवर्तन की आस जगाई। उत्तराखंड के साल 1977 में चले वन बचाओ आंदोलन, 1984 के नशा नहीं रोजगार दो और 1994 में हुए उत्तराखंड आंदोलन में गिर्दा की रचनाओं ने जान फुंकी थी। इतना ही नहीं उसके बाद भी हर आंदोलन में गिर्दा ने बढ़-चढ़कर शिरकत की, लेकिन 22 अगस्त 2010 को अचानक गिर्दा की आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। गिर्दा ने जिस राज्य की कल्पना की थी और जिस ध्येय को लेकर पृथक राज्य के रूप उत्तराखंड का गठन हुआ। वो सपना आज भी अधूरा है। आज हमें गिर्दा की कमी बहुत खल रही है। इन 26 सालों में जो भी सरकार आई वो जन आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई। प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट बदस्तूर जारी है। ऐसे में अगर गिर्दा आज जिंदा होते तो बहुत दु:खी होते। उनकी रचनाएं सत्ता की उस लूट खसोट को ही उजागर करती है। यह गिर्दा के जनवादी होने का ही प्रमाण था कि समाज की कुरीतियां कभी उनके उपर हावी हो पायी। उन्होंने रचनाओं से हमेशा राजनीति के ठेकेदारों पर गहरा वार किया। राज्य आंदोलन के दौरान लोगों को एक साथ बांधने का काम भी गिर्दा ने किया। सरोवर नगरी नैनीताल में एक आंदोलन में गिर्दा ने हम लड़ते रैया भुला हम लड़ते रूंला.., ओ जैंता एक दिन तो आलो यो दिन यो दुनि मां.., उत्तराखंड मेरी जन्मभूमि तेरी जैजैकारा.., जन एकता कूच करो.. समेत कई जनगीतों से जान फूंक दी थी। नैनीताल में उनके साथी सभी रंगकर्मियों का कहना है कि आज जो हालात उत्तराखंड में बने हैं अगर गिर्दा जिंदा होते तो वो अपनी रचनाओं और गीतों से आज भी सत्ता को चुनौती दे रहे होते। गिर्दा के जाने से जो शून्य उत्तराखंड में बना है उसकी भरपाई करना मुश्किल है, हालांकि, गिर्दा का ये गीत ‘जैता एक दिन तो आलु, दिन ए दुनि में’ हमेशा पहाड़ी जनमानस को सतत संघर्ष के लिए प्रेरित करता रहेगा। गिर्दा एक ऐसी सख्सियत थे। जिनका प्रभाव हर वर्ग पर रहा। बीड़ी की चुस्कियां लेते, नगाड़ों व हुड़के की थाप पर पहाड़ के लोगों को चेताते गिर्दा की छवि बिल्कुल भी धूमिल नही हुई है। आज वह जनता के दिलों में है पर इस काहिल सरकारों से कोसों दूर हैं। आज उनकी पत्नी 72 वर्षीय हेमलता नैनीताल में साधारण से किराये के कमरे में रहती है। अपने दिवंगत पति गिर्दा को नाट्यप्रभाग भारत सरकार से मिलने वाले 20 हजार रुपए की पेंशन पर जीवनयापन कर रही हैं। उनके इकलौते पुत्र को सरकारी नौकरी नही है। जिस पलायन की त्रासदी की चेतावनी गिर्दा देते थे वह आज उन्हीं पर लागू हो रही है। चूंकि उनका पुत्र तुहिनांशु दिल्ली में छोटी मोटी प्राइवेट नौकरी कर जीवन की गाड़ी चला रहा है। बकौल गिर्दा…हम लड़ते रैया भुला हम लड़ते रूंला….

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