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जब आकाशवाणी से घोषणा करनी पड़ी थी कि गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे है…..हे राम….

इन्द्रेश मैखुरी, देहरादून। महात्मा गांधी का हत्यारा अधर्मी नाथूराम गोडसे हाई स्कूल पास नहीं हो सका. वह पढ़ने में कमजोर था. बुद्धि पर बहुत ज़ोर लगाने के बाद भी जब हाई स्कूल की चढ़ाई न चढ़ सका तो स्कूल छोड़ दिया उसने. हाई स्कूल बड़ी बाधा है रे बाबा, इस जमात के लिए ! आज़ादी की लड़ाई के तमाम बड़े नेताओं को याद कीजिये. गांधी, नेहरू पटेल, सुभाष चंद्र बोस,भगत सिंह सब खूब पढे-लिखे. दुनिया भर के साहित्य,समाज, इतिहास,राजनीति के जानकार. और हिंदुओं का स्वयंभू ठेकेदार वो जिससे हाई स्कूल की परीक्षा पास न हुई ! उसने कपड़े का धंधा किया,वह नहीं चला तो टेलर की दुकान में काम करने लगा. वहाँ भी मामला जमा नहीं. काम-धंधा उससे चला नहीं,पढ़ना-लिखना उसके बस का हुआ नहीं तो अब वह क्या करे ?वह एकाएक हिंदुओं का ठेकेदार हो गया और उसका एक अखबार हो गया ! गजब है भाई, पढ़ना-लिखना बस का था नहीं तो  खुद का अखबार निकाल कर संपादक हो गया ! वैसे आज पढ़े-लिखे डिग्रीधारी भी जब मीडिया चला रहे हैं तो उनकी शैली देख कर लगता है कि उन्हें सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ लड़ते हुए बलिदान होने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों से प्रेरणा नहीं मिलती बल्कि अनपढ़ से थोड़ा ही ऊपर पढ़ा गोडसे, उन्हें अपना पुरखा नजर आता है. खबर के नाम पर झूठ और अफवाह परोसने के लिए पढ़ाई-लिखाई की वैसे भी क्या जरूरत ? आजाद देश में आतंकवाद की पहली वारदात को अंजाम देने वाले इस कायर-हत्यारे को उसके वैचारिक वारिस बड़ा भारी वीर सिद्ध करना चाहते हैं. लेकिन कायरता का इंतहा देखिये कि उसने कभी अंग्रेजों पर गोली चलाना तो छोड़िए कंकड़ तक नहीं उछाला. उसका भाई गोपाल गोडसे जो गांधी की हत्या में उसके साथ था,उसने हाई स्कूल करने के बाद नाथूराम के साथ कुछ दिन टेलर की दुकान में काम किया और उसके बाद अंग्रेजों की फौज में सिविलियन कार्मिक के तौर पर पूना के निकट एक मिलेट्री स्टेशन में स्टोर कीपर के तौर पर भर्ती हो गया. गांधी हत्याकांड का एक अन्य अभियुक्त नारायण आप्टे अंग्रेजों की वायु सेना में भर्ती हुआ था. 20 जनवरी 1948 को गांधी की प्रार्थना सभा पर बम फेंकने वाला मदन लाल पाहवा स्कूल छोड़ कर भाग गया ताकि  अंग्रेजों की नौसेना में भर्ती हो सके ! इस तरह देखें तो इस पूरा गिरोह को अंग्रेज़ों की चाकरी करने में कोई दिक्कत नहीं थी. यहाँ तक कि अंग्रेज़ों की फौज में काम करने को भी वे उतावले से थे. अंग्रेज़ों के खिलाफ बंदूक उठाना उनकी कल्पना में तक नहीं आया. गोली चलाने के लिए जो पहला निशाना उन्होंने चुना वो आजाद भारत में 78 वर्षीय गांधी थे. अपने उम्र के अंतिम पड़ाव पर खड़े, भूख हड़ताल से जर्जर बूढ़े को मारने के लिए जीवन में पहली बार बंदूक उठाने वाले हत्यारों के मानस पुत्र चाहते हैं कि उनके ऐसे कायर पुरखे को वीर समझा जाये ! अफवाहबाजी इस जमात का खास पैंतरा है. गांधी की हत्या के बाद कायर हत्यारों की इस जमात ने अफवाह फैलाना शुरू किया कि गांधी की हत्या किसी विधर्मी ने की है. गांधी की हत्या करने के बाद देश को दंगों में झुलसाने की यह कोशिश थी. इसी वजह से आकाशवाणी से घोषणा करनी पड़ी थी कि गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे है,जिसे गिरफ्तार कर लिया गया. उस कायर हत्यारे के वंशज आज भी हिंसा,घृणा,नफरत और षड्यंत्र के उस बोझ को ढोते फिर रहे हैं और उसे देशभक्ति समझ रहे हैं. देश को उस कायर हत्यारे के वंशजों की इस घृणास्पद दृष्टि से बचाए रखना बेहद जरूरी है.

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