राजनीति
उत्तराखंड में नाम तलाशते रहे नेता, दिल्ली में बढ़ा संजीव आर्या का कद : कांग्रेस की नई पीढ़ी के बड़े चेहरे के रूप में उभरते संकेत
मनोज लोहनी, हल्द्वानी। उत्तराखंड कांग्रेस की नई प्रदेश कार्यकारिणी के ऐलान के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि किसे संगठन में जगह मिली और कौन सूची से बाहर रह गया। कई नेता देर रात तक जारी सूची में अपना नाम तलाशते रहे। प्रदेश कार्यकारिणी में स्थान पाने की होड़ के बीच एक ऐसा चेहरा भी रहा, जिसका राजनीतिक ग्राफ प्रदेश की सूची से कहीं आगे राष्ट्रीय स्तर पर ऊपर उठता दिखाई दिया। यह चेहरा है संजीव आर्य का। जब उत्तराखंड में नेता प्रदेश कार्यकारिणी में अपनी जगह तलाश रहे थे, उसी समय संजीव आर्य पहले ही कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन में सचिव और उत्तर प्रदेश के सह-प्रभारी जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके थे। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह केवल एक संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि कांग्रेस हाईकमान के भरोसे का संकेत भी है। संजीव आर्य का राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत कम समय में तेजी से आगे बढ़ा है। नैनीताल से विधायक रहने के दौरान उन्होंने क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनका सहज और डाउन-टू-अर्थ व्यवहार माना जाता है। यही कारण है कि वे केवल समर्थकों तक सीमित नहीं, बल्कि विरोधी खेमों में भी एक सहज और संवादशील नेता के रूप में पहचाने जाते हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उत्तराखंड कांग्रेस में आने वाले समय में नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार हो रही है और संजीव आर्य उसी पीढ़ी के प्रमुख चेहरों में शामिल दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय संगठन में मिली जिम्मेदारी उनके राजनीतिक भविष्य को और मजबूत आधार देती है। उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य में सह-प्रभारी की भूमिका संभालना भी पार्टी नेतृत्व के भरोसे को दर्शाता है। संजीव आर्य के राजनीतिक व्यक्तित्व पर उनके पिता और उत्तराखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। यशपाल आर्य को प्रदेश की राजनीति में संतुलित, संगठनात्मक और सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाले नेताओं में गिना जाता है। माना जाता है कि राजनीतिक संस्कार संजीव आर्य को विरासत में मिले, लेकिन अब वह अपनी अलग पहचान और कार्यशैली भी स्थापित कर रहे हैं। हाल के वर्षों में संजीव आर्य ने संगठनात्मक सक्रियता, कार्यकर्ताओं से लगातार संवाद और राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ बेहतर तालमेल के जरिए अपनी अलग जगह बनाई है। यही वजह है कि उनकी भूमिका अब केवल एक पूर्व विधायक तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि उन्हें कांग्रेस की भविष्य की नेतृत्व पंक्ति में भी देखा जाने लगा है।



























